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Guru Govind Singh Jayanti | गुरु गोविन्द सिंह जयंती

गुरु गोबिंद सिंह जयंती
गुरु गोबिंद सिंह जी सिख धर्म के दसवें गुरु हैं. इनका जन्म सन 1666 में हुआ था. इन्हें सिख धर्म का सबसे वीर योद्धा और गुरु माना जाता हैं. इनकी याद में ही प्रत्येक वर्ष गुरु गोबिंद सिंह जी की जयंती जनवरी माह में सिंखों के द्वारा बहुत धूमधाम से मनाई जाती हैं.

जन्म स्थान
गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म पटना में हुआ था. इनकी माता का नाम गुजरी था तथा इनके पिता का नाम श्री तेगबहादुर था. जो सिख धर्म के नौवें गुरु थे. गुरु गोबिंद सिंह जी का नाम बचपन में गोविन्द राय था. जिसे सन 1699 की बैसाखी के दिन बदलकर गुरु गोबिंद सिंह कर दिया गया. तभी से ये गुरु गोबिंद सिंह जी के नाम से जाने जाते हैं.    
      
खालसा पंथ की स्थापना
गुरु गोबिंद सिंह जी ने ही 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की थी. खालसा पंथ की स्थापना करने के लिए इन्होने पांच प्यारे बनाए थे और उन्हें गुरु का दर्जा दिया था तथा यह कहा था कि “ जहाँ पांच सिख इकट्ठे होगें मै वहाँ पर ही निवास करूंगा. ” गुरु गोबिंद सिंह जी ने पांच प्यारे को गुरु का पद्द प्रदान कर स्वयं को इनका अनुयायी अर्थात शिष्य घोषित किया था. CLICK HERE TO READ MORE ABOUT GURUNANAK JAYANTI ...
Guru Govind Singh Jayanti
Guru Govind Singh Jayanti


खालसा पंथ की स्थापना करने का तथा पांच प्यारे को गुरु बनाने का मुख्य उद्देश्य व्यक्तियों के मन, कर्म वचन को शुद्ध कर समाज के प्रति समर्पण भाव को जागृत करना था. गुरु गोबिंद सिंह जी ने पांच गुरुओं के साथ मिलकर जातिगत भेद – भाव को समाप्त किया, सभी धर्मों एवं जातियों में एकात्मकता तथा समानता की भावना का प्रसार किया तथा लोगों में आत्म – सम्मान की भावना को भी जगाया.

गुरु गोबिंद सिंह जी का मुख्य नारा
गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ में “सिंह” उपनाम लगाने की परम्परा की शुरुआत की तथा इसके साथ ही एक नया नारा भी लगाया था. “ वाहे गुरु जी का खालसा, वाहे गुरु जी की फतेह ”. यह नारा आज सिख धर्म का प्रसिद्ध नारा बन गया हैं. जिसका प्रयोग सिख धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति प्रत्येक कार्य को आरम्भ करने से पहले करते हैं.

गुरु गोबिंद सिंह जी कवि के रूप में
गुरु गोबिंद सिंह जी एक साहसी योद्धा के साथ – साथ एक अच्छे कवि भी थे. इन्होंने बेअंत वाणी के नाम से एक काव्य ग्रंथ की रचना की. इस ग्रंथ की रचना करने का गोविन्द जी का मुख्य उद्देश्य पंडितों, योगियों तथा संतों के मन को एकाग्र करना था.

गुरु गोविन्द सिंह के द्वारा “गुरु ग्रंथ साहिब” की स्थापना  
गुरु गोविन्द सिंह जी ने ही अपने जीवन काल में गुरु की पदवी को समाप्त करने के लिए गुरु ग्रंथ साहिब को सिख धर्म के अंतिम गुरु के रूप में स्थापित किया और यह घोषणा की, “कि आज के बाद सिख धर्म में कोई देहधारी गुरु नहीं होगा.” तब से ही सिख धर्मं में गुरु वाणी तथा गुरु ग्रंथ साहिब को ही गुरु का अंतिम स्वरूप माना जाता हैं तथा उन्हें गुरु के रूप में पूजा जाता हैं. CLICK HERE TO READ MORE ABOUT स्वामी विवेकांनद जयंती तथा युवा दिवस ...
गुरु गोविन्द सिंह जयंती
गुरु गोविन्द सिंह जयंती   

पांच ककार की घोषणा –
गुर गोविन्द सिंह जी एक वीर यौद्धा के पुत्र थे था स्वयं भी के वीर यौद्धा थे. इनके पिता श्री गुरु तेग बहादुर सिंह जी ने तथा इन्होनें मुग़ल शासकों के विरुद्ध काफी युद्ध लडे थे. जिन युद्धों में इनके पिता जी शहीद हो गये थे. श्री तेगबहादुर जी के शहिद होने के बाद ही सन 1699 में गुरु गोविन्द सिंह जी को दशवें गुरु का दर्जा दिया गया था. गुरु गोविन्द सिंह जी ने युद्ध लड़ने के लिए कुछ अनिवार्य ककार धारण करने की घोषणा भी की थी.

गुरु गोबिंद सिंह जी ने युद्ध की स्थिति का सामना करने के लिए पांच ककार को आवश्यक रूप से धारण करने की घोषणा की थी. इन पांच ककारों को सिख लोग आज के समय में भी धारण करते हैं तथा इसे पहनना अपना गौरव समझते हैं. पांच ककार के बारे में जानकारी निम्नलिखित दी गई हैं –

1.       केश – पांच ककार में सबसे पहला ककार केश माना गया हैं. जिसे गुरु और ऋषि मुनि धारण करते आये हैं तथा जो आज प्रत्येक सिख के लिए उनके सम्मान का प्रतीक हैं.

2.       कंघा- लम्बे केशों को ठीक रखने के लिए दूसरा ककार लकड़ी का कंघा हैं.

3.       कच्छा – युद्ध के समय शरीर में फुर्ती के लिए तीसरा ककार कच्छा बताया गया हैं.

4.       कड़ा – कड़ा चौथा ककार हैं. इसे नियमित और संयम में रहने के लिए एक चेतावनी देनी वाली वस्तु माना गया हैं.

5.       कृपाण (तलवार) – कृपाण पांचवा एवं अंतिम ककार हैं. इसे अपनी रक्षा करने के लिए रखना अनिवार्य होता हैं.

गुरु गोविन्द सिंह जयंती के बारे में अधिक जानने के लिए आप तुरंत नीचे कमेंट करके जानकारी हासिल कर सकते है.  
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