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Vastushastra ki Dishaon ka Gyaan | वास्तुशास्त्र की दिशाओं का ज्ञान

वास्तु और दिशा (Vastushastra And Directions)
हम सभी हमेशा चार दिशाओं पर ही विचार और विमर्श करते हैं. लेकिन यदि वास्तुशास्त्र के अनुरूप दिशाओं का अध्ययन किया जाये तो इसमें चार दिशाओं के अलावा भी चार दिशाओं का वर्णन किया गया हैं. जिन्हें वास्तु शास्त्र के अंतर्गत निम्नलिखित नामों से जाना जाता हैं – CLICK HERE TO READ MORE ABOUT सही दिशा में हो द्वार तो खुशियाँ आयें घर में बेशुमार ...
Vastushastra ki Dishaon ka Gyaan
Vastushastra ki Dishaon ka Gyaan
1.                        ईशान (पूर्व दिशा और उत्तर दिशा)
2.                        आग्नेय (पूर्व एवं दक्षिण दिशा)
3.                        नैऋत्य (दक्षिण और पश्चिम दिशा)
4.                        वायव्य (पश्चिम तथा उत्तर दिशा)

वास्तु शास्त्र में इन चारों दिशाओं को भी पूर्व, उत्तर, दक्षिण और पश्चिम दिशाओं के समान ही महत्वपूर्ण माना गया हैं और यह कहा गया हैं कि भवन निर्माण में पांच तत्वों की ही भांति इन 8 दिशाओं का पर भी ध्यान देना आवश्यक हैं. क्योंकि यदि किसी भवन का निर्माण इन दिशाओं को नजरंदाज करके किया जाए तो उस भवन के स्वामी को परेशानियों, कष्टों और दुखों का सामना अपने सम्पूर्ण जीवन में करना पड सकता हैं.

इसलिए यदि आप नया घर बनाने की योजना बना रहें हैं. तो इन दिशाओं का ध्यान अवश्य रखें. इन 8 दिशाओं के बारे में सम्पूर्ण जानकारी नीचे दी गई हैं.  

1.पूर्व दिशा (East) – पूर्व दिशा वह दिशा हैं जहाँ से रोजाना सुबह सूर्य उदय होता हैं और अपनी तेज किरणों का प्रसार कर पूरी पृथ्वी को पौषक तत्व प्रदान करता हैं. जिसकी जरुरत हर व्यक्ति, जीव जंतु और वनस्पति को होती हैं. इस दिशा का स्वामी इन्द्र देवता हैं. इसीलिए इस दिशा को सूर्य का निवास स्थान माना जाता हैं. नीचे कुछ महत्वपूर्ण बातें इस दिशा के बारे में बताई जा रही हैं जिनका ध्यान जरूर रखें –

·     भवन का निर्माण करते हुए इस दिशा में कभी भी शौचालय न बनवाएं. क्योंकि यदि आप इस दिशा में शौचालय बनवाते हैं तो आपके धन की हानि हो सकती हैं. CLICK HERE TO READ MORE ABOUT वास्तु के साथ ग्रहों का सम्बन्ध ...
वास्तुशास्त्र की दिशाओं का ज्ञान
वास्तुशास्त्र की दिशाओं का ज्ञान
·     भवन जब पूरी तरह से निर्मित हो जाए तो गृह प्रवेश करने के बाद इस दिशा को साफ और स्वच्छ रखें. क्योंकि इस दिशा को पितृ दिशा भी माना जाता हैं और इस दिशा से ही वंश वृद्धि जुडी हुई होती हैं.

·     भवन का निर्माण करवाते समय यह ध्यान रखें कि पूर्व दिशा की चार दीवारे पश्चिम दिशा में बनी चार दीवारों से अधिक ऊंची न हो. क्योंकि इससे आपकी संतान को नुकसान पहुँच सकता हैं.

2.  पश्चिम दिशा (West) – जिस दिशा से सूर्य अस्त होता हैं वह दिशा पश्चिम दिशा कहलाती हैं. इस दिशा के स्वामी वरुण देवता को माना जाता हैं. इसके अलावा इस दिशा को वायु तत्व से प्रभावित माना जाता हैं और कहा जाता हैं कि वायु तत्व वाली दिशा बहुत ही चंचंल होती हैं और इस दिशा से घर में चंचलता बनी रहती हैं. घर का निर्माण करवाते समय आप अपने घर में स्थित सभी कमरों का मुख इस दिशा में बना सकते हैं. इस दिशा में सभी दरवाजों का मुख करने से वरुण देवता की कृपा आपके घर पर सदैव बनी रहती हैं तथा वो आपके घर को यश, कीर्ति और भव्यता प्रदान करते हैं. इस दिशा में दरवाजे लगवाने का एक और लाभ यह हैं कि आपके घर के सभी सदस्यों का मन हमेशा प्रसन्न रहता हैं.
Sabhi Dishaon ke Ghar ka Vastu
Sabhi Dishaon ke Ghar ka Vastu    
पश्चिम दिशा का प्रतिनिधि ग्रह (Planet of West Direction) पश्चिम दिशा का प्रतिनिधि ग्रह शनि हैं. इसीलिए वास्तुशास्त्र के अनुसार यह माना जाता हैं कि घर के सभी कमरों के दरवाजों का मुख इस दिशा की ओर आप कर सकते हैं लेकिन इस दिशा की ओर कभी भी घर का मुख्य द्वार न बनवाएं. इससे घर के मुखिया की तबियत ख़राब हो सकती हैं तथा इसका प्रभाव उसकी आमदनी पर भी पड सकता हैं.
 
3.दक्षिण दिशा (South) यदि आप सूर्योदय के समय अपना मुख सूर्य की तरफ करके खड़े हो जाएँ तो आपके दायें हाथ की दिशा दक्षिण दिशा कहलाती हैं. इस दिशा का स्वामी यमराज हैं. यमराज को हम सभी मृत्यु के दवता मानते हैं. और इसीलिए उनसे डरते भी हैं. लेकिन वास्तु शास्त्र में इस दिशा को दोषयुक्त दिशा न बताकर भाग्यशाली अर्थात भाग्य को चमकाने वाली दिशा माना गया हैं.
·     इस दिशा को व्यक्ति के जीवन में धैर्य व स्थिरता लाने का प्रतीक माना गया हैं.

·     इस दिशा को हर प्रकार की बुराइयों को नष्ट करने वाला माना गया हैं.

·     इस दिशा का एक बहुत ही अच्छा उदहारण दक्षिण दिशा में स्थित तिरुपति मंदिर को माना गया हैं. जोकि दक्षिण दिशा में स्थित होने के बाद भी बहुत ही समृद्ध और प्रसिद्ध हैं.
Aathon Dishaon ke Grah Aur Svami
 Dishaon ke Svami
इस दिशा का स्वामी तो यमराज हैं लेकिन इस दिशा का ग्रह मंगल हैं. वास्तु शास्त्र के अनुसार जब भी भवन का निर्माण करें तो सबसे पहले इस दिशा से काम शुरू करें और और जब इस दिशा का काम पूरा हो जाए तो उसमें भारी समान या भवन निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री को रखकर इसे अच्छी तरह से बंद कर दें. इस दिशा को कभी भी खूला न छोड़े. वरना आपको शत्रु भय सता सकता हैं, बीमारियां हो सकती हैं. 

4.उत्तर दिशा (North) यदि आप चढते हुए सूर्य की ओर अपना मुख करके खड़े होते हैं तो आपके बाएं हाथ की दिशा उत्तर दिशा कहलाएगी. इस दिशा को वास्तु शास्त्र में जल तत्व की दिशा माना जाता हैं. इस दिशा के स्वामी कुबेर महाराज हैं. इसलिए इस दिशा को बहुत ही शुभ माना जाता हैं. घर बनवाते समय इस दिशा की दीवारों को अन्य दिशाओं की थोडा नीचे बनवाना चाहिए. इससे आपके घर पर कुबेर महाराज की कृपा बनी रहती हैं और जिससे आपको धन, सुख, समृद्धि और यश की प्राप्ति होती हैं. वास्तु शास्त्र के अनुसार यदि सम्भव हो तो इस दिशा के स्थान को खुला छोड़ देना चाहिए.
Ghar Bhavan par Dishaon ke Shubh Ashubh Prabhav
Ghar Bhavan par Dishaon ke Shubh Ashubh Prabhav
5.आग्नेय कोण (East And South)  – वास्तुशास्त्र के अंतर्गत जिस स्थान पर पूर्व एवं दक्षिण दिशा मिल जाती हैं. उसे आग्नेय कोण कहा जाता हैं. जैसा की अप इसके नाम से ही अंदाजा लगा सकते हैं इस कोण का प्रमुख तत्व अग्नि हैं. इस कोण का सीधा समबन्ध घर के सदस्यों के स्वास्थ्य से जुड़ा होता हैं. इस कोण के बारे में वास्तुशास्त्र  में कहा गया हैं कि यह कोण हमेशा स्वच्छ होना चाहिए. यदि इस कोण में गंदगी होगी तो इससे घर परिवार के किसी न किसी एक सदस्य की तबियत हमेशा ख़राब हो सकती हैं तथा उसका स्वभाव चिडचिडा और क्रोधी हो सकता हैं. भवन बनवाते हुए इस बात का ध्यान रखें कि घर का आग्नेय कोण बढ़ा हुआ न हो. यदि ऐसा हैं तो आपके संतान को दिक्कतों का सामना करना पड सकता हैं. इस दिशा के स्वामी गणेश भगवान हैं और ग्रह शुक्र हैं.
Ghar Par Aath Dishaon ka Prabhav
Ghar Par Aath Dishaon ka Prabhav
6.ईशान कोण (East And North) पूर्व दिशा और उत्तर दिशा के बीच के स्थान को ईशान कोण की संज्ञा दी जाती हैं. इस दिशा को देवी – देवताओं का निवास स्थान माना जाता हैं तथा इसीलिए हिन्दू समुदाय के लोग प्रमुख रूप से इस स्थान पर ही सभी शुभ कार्यों को पूर्ण करते हैं. वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के जिस कोण में सूर्य उदय के पश्चात् सूर्य की प्रथम किरने पड़ती हैं वह कोण ही ईशान कोण हैं. यह कोण धैर्य, विवेक, बुद्धि और ज्ञान का प्रतीक माना जाता हैं. इसलिए घर में इस कोण को हमेशा शुद्ध एवं पवित्र रखना चाहिए. यदि इस दिशा में किसी भी प्रकार की कोई दूषित वस्तु रखी हुई होती हैं तो इस घर में कलह – कलेश की स्थिति उत्पन्न हो सकती हैं तथा व्यक्ति की बुद्धि भी भ्रष्ट हो सकती हैं. इस दिशा के स्वामी भगवान शिव हैं तथा ग्रह बृहस्पति हैं.   
Aathon Dishaon ke Grah Aur Svami
Aathon Dishaon ke Grah Aur Svami
7.नैऋत्य कोण (South And West) दक्षिण और पश्चिम के बीच के खाली स्थान को नैऋत्य कोण के नाम से जाना जाता हैं. इस कोण को व्यक्ति के चरित्र का चिन्ह माना जाता हैं. यदि किसी कारण वश भवन का यह कोण दूषित हैं तो इससे व्यक्ति के चरित्र पर उंगलियाँ उठ सकती हैं तथा उसे हमेशा शत्रु का भय सताता रहता हैं, दुर्घटना होने की सम्भावना बनती हैं तथा कम उम्र में ही व्यक्ति की मौत होने की आशंका रहती हैं. इन सभी दोषों से बचने के लिए यह ध्यान रखें कि घर के इस कोण में किसी भी प्रकार का कांटेदार वृक्ष न लगा हो, कोई गड्ढा न हो तथा घर पर किसी बहुत प्रेत का साया न हो. यदि इस दिशा में ये सभी चीजें हैं तो आपके घर का स्वामी बीमारी रह सकता हैं उसके धन का नाश हो सकता हैं. इस दिशा के इतने भयंकर परिणाम इसीलिए हैं क्योंकि इस दिशा का स्वामी राक्षस हैं तथा प्रमुख ग्रह राहु हैं.

8.वायव्य कोण (West And North) जो दिशा पश्चिम तथा उत्तर दिशा को एक साथ जोड़ती हैं उसे वायव्य कोण या दिशा कहा जाता हैं. इस कोण के नाम से ही यह आसानी पता चल जाता हैं कि इस दिशा का प्रमुख तत्व वायु हैं इस दिशा से मनुष्य को दीर्घायु, तथा शांति प्राप्त होती हैं तथा यदि इस कोण में किसी प्रकार का दोष हैं तो आपकी कुंडली में बेशक भाग्यशाली योग बन रहे हो लेकिन आपकों उन योग का लाभ कभी प्राप्त नहीं होगा. यदि आपके घर के वायव्य कोण का अधिकतर हिस्सा गोलाकार में हैं तो इससे घर के स्वामी को परेशानियाँ तथा गुप्तांगों से सम्बन्धित रोग हो सकते हैं. इस ग्रह के स्वामी बटुक हैं तथा मूल ग्रह चंद्रमा हैं.

भवन निर्माण में दिशाओं, पांच तत्वों तथा ग्रहों के
स्थान के बारे में अधिक जानने के लिए आप नीचे
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 Jaane Sabhi Dishaon ke Ghar ka Vastu
 Jaane Sabhi Dishaon ke Ghar ka Vastu    

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