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Kya Hai Guru Ka Mahtv | क्या है गुरु का महत्व | What is the Significance of Guru


बिना गुरु के ज्ञान नही होता ( No Knowledge without Master )
जब भी गुरु शब्द का जिक्र किया जाता है तो किसी महान संत की तस्वीर मन में अपने आप बन जाती है. वैसे गुरु सिर्फ वो ही नहीं होता जिसने गेरुआ रंग पहना हो, हाथ में कमंडल हो, बाजुओं में रुद्राक्ष की माला हो और वो मन्त्रों का उच्चारण कर रहा हो. बल्कि गुरु तो वो होता है जो आपके अंदर के अंधकार को मिटाकर प्रकाश का संचार करें, साथ ही गुरु आपकी अज्ञानता को मिटाता है. इसलिए हम अपने अध्यापक को भी गुरु ही कहते है. CLICK HERE TO KNOW कुण्डलिनी शक्ति को कैसे जागृत करें ...
Kya Hai Guru Ka Mahtv
Kya Hai Guru Ka Mahtv
गुरु शब्द संस्कृत भाषा से जन्मा है, जहाँ इसका निर्माण 2 व्यंजनों से हुआ है. पहला गु और दूसरा रु ”. जहाँ गु से मतलब अज्ञान से है वहीँ रू से अभिप्राय आध्यात्मिक ज्ञान के प्रकाश व तेज से है. तो इस तरह गुरु से अभिप्राय उस आध्यात्मिक तेज से है जो अज्ञानता का नाश करके अनु भुतियों को प्रदान करता है. व्यक्ति को अपने हर क्षेत्र में गुरु की आवश्यकता होती ही है. इसलिए कहा भी जाता है कि बिना गुरु के ज्ञान नहीं होता. आज हम अपनी इस पोस्ट में उस गुरु की बात करेंगे जो आध्यात्म की तरफ लेकर जाता है और आध्यात्मिक ज्ञान से मन को प्रकाशित करता है. 

आध्यात्म ( Spirituality ) :
आध्यात्म को एक ऐसा विषय माना जाता है जो दिमाग की समझ से थोडा परे होता है. इसीलिए जो भी व्यक्ति आध्यात्म के रास्ते पर चलना चाहता है उसे एक तेजस्वी और उन्नत मार्गदर्शक को खोजना पड़ता है. किन्तु ऐसे गुरु की पहचान और इनका मिलना भी बहुत कठिन होता है. ऐसे गुरु इस संसार के अलावा व्यक्ति के भीतर स्थित संसार के बारे में बताते है और बताते है कि उस संसार में कैसे प्रवेश किया जा सकता है. साथ ही ये मनुष्य के अंदर बने उस रास्ते को भी खोजने में मदद करते है जो मनुष्य की आत्मा को सीधा परमात्मा तक लेकर जाता है.  CLICK HERE TO KNOW मूलाधार चक्र को कैसे जगायें ...
क्या है गुरु का महत्व
क्या है गुरु का महत्व
संत ( Saint ) :
गुरु जो अपनी साधना और तपस्या से आध्यात्मिक स्तर पर काफी आगे निकल जाते है उनका मोह इस संसार से बिलकुल खत्म हो जाता है क्योकि उसे पता चल जाता है कि ये संसार नश्वर है और वे उस संसार में जाने का प्रयास करते रहते है जिसका कभी विनाश नही होना. ऐसा भी माना जाता है कि जो व्यक्ति 70 % तक आध्यात्मिक स्तर पर पहुँच जाता है वो संत बन जाता है. ये संत ही मानव समाज के लिए मार्गदर्शक का कार्य भी करते है और जो भी व्यक्ति इनकी शरण में जाता है ये उस व्यक्ति को मोक्ष प्राप्ति में पूर्ण मदद भी करते है. कुछ तो ऐसे भी है जो अपने मार्गदर्शन में इतना विश्वास रखते है कि वे मोक्षप्राप्ति का पूरा उत्तरदायित्व तक स्वीकार कर लेते है और अंत में मोक्ष प्राप्त करवा भी देते है.

गुरु और ईश्वर का संबंध ( Relation of Guru and God ) :
ऐसे संत मानव को आध्यामिक दृष्टि से प्रेम करते है और सभी को सामान दृष्टि से देखते है. इनका अहंकार खत्म हो जाता है जिसके लिए ये अपनी पाँचों इन्द्रियों, बुद्धि और मन को साधते है. ये अपनी आत्मा को सिमित नहीं रखते और उसे भीतर व्याप्त ईश्वर में व्याप्त कर देते है. इसीलिए गुरु को ईश्वर का ही रूप माना जाता है. इनमे एक अलग शक्ति होती है. वैसे ये भी माना जाता है कि गुरु की तुलना में संतों में अधिक अहम् होता है और इसी वजह से उनकी शक्ति अधिक प्रकट होती है. 
What is the Significance of Guru
What is the Significance of Guru
प्रकट शक्ति ( Visual Power ) :
पहले तो आप इस बात को समझ लें कि जितनी अधिक प्रकट शक्ति होती है उतना ही व्यक्ति ईश्वर से दूर होता चला जाता है और इस प्रकट शक्ति को कम करने के लिए उतना ही अधिक प्रयास करना पड़ता है. जब कोई संत किसी व्यक्ति को अपने आशीर्वाद से मुक्त कराता है तो उसकी प्रकट शक्ति करीब 20 % की होती है. किन्तु वे व्यक्ति जो संत ना होने पर भी अतीन्द्रिय शक्ति से निजात व मुक्ति दिलाते है उनकी प्रकट शक्ति करीब 50 % होती है. किन्तु ईश्वर की प्रकट शक्ति 0 % होती है. ये प्रकट शक्ति कहीं ना कहीं ईश्वर से एकरूप होने से सम्बंधित होती है. 

प्रकट शक्ति के लक्षण ( The Symptoms of Visual Power ) :
प्रकट शक्ति के कुछ लक्षण भी होते है जैसेकि चमकीली आँखें, हाथों की तेज गतिविधियाँ और छेहरे पर तेज. हर शिष्य को शुरूआत में अपने गुरु से ही कुछ प्रकट शक्ति मिलती है. ताकि वो अपने निर्धारित कार्यों को कर सकते. कुछ कार्य तो ऐसे भी हो जाते है जिनको करने के लिए अधिक शक्ति की जरूरत होती है. इस शक्ति का इस्तेमाल हर गुरु अपने शिष्य के आध्यात्मिक विकास को केन्द्रित करने में लगता है. जिससे शिष्य आत्मनिर्भर बन सके और वो अपनी हर समस्याओं को मात दे सके. इस तरह गुरु हर समय अपनी शक्ति का व्यय करता है. 
आखिर क्या होता है गुरु
आखिर क्या होता है गुरु
हर संत और गुरु का न्यूनतम आध्यात्मिक स्तर 70 % माना जाता है अगर कोई गुरु अपने स्तर को 70 % से 80 % कर लेता है तो वो गुरु से सद्गुरु बन जाता है. संतों की तुलना में गुरु इस उपाधि को अधिक शीघ्रता से प्राप्त करते है क्योकि वे निरंतर अपने शिष्यों को आध्यात्म के मार्ग पर ले जाने का प्रयास करते रहते है जिस कारण वे खुद भी अधिक देर तक आध्यात्म के मार्ग पर रहते है. 

देवता और गुरु में अंतर ( Difference Between Deities and Guru ) :
कोई भी देव हो या ईश्वर हो वे अपने अस्तित्व को कभी भी प्रकट नहीं करते, किन्तु जब गुरु की हो तो वे प्रत्यक्ष रूप से देह में अपने शिष्यों का मार्गदर्शन करते है. ये अप्रत्यक्ष रूप में विराजमान गुरु की तरह ही सर्वज्ञानी होते है और अपने शिष्य को अपना पूरा ज्ञान देने की कोशिश करते है. हर गुरु अपने शिष्य की लग्न, उनकी मेहनत, उनकी गलतियों को अपनी शक्तियों की मदद से आसानी से जान पाते है और उन्हें सुधारने में शिष्य की सहायता करते है. साथ ही गुरु अपने शिष्य का मनोबल भी नहीं टूटने देते और ना ही उनकी सोच को न्यून होने देते है. 
Guru to Guru Hota Hai
Guru to Guru Hota Hai
हर गुरु धर्म व जाती से परे होता है. ना वे संस्कृति में कोई भेद करते है और ना ही लिंग में. इसलिए जो भी अपने आध्यात्म की उन्नति करना चाहता है वो किसी गुरु के पास जाकर उनकी शरण ग्रहण कर सकता है.

तो इस तरह आप भी गुरु की शरण में जाकर आध्यात्म के मार्ग पर चल सकते हो. साथ ही अन्य किसी सहायता के लिए आप तुरंत नीचे कमेंट करके जानकारी हासिल कर सकते हो. 
Sant or Guru mein Antar
Sant or Guru mein Antar

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