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Pranayam or Yog ke Prakar | प्राणायाम और योग के प्रकार | Types of Pranayam and Yog

प्राणायाम के प्रकार :
1.       नाड़ीशोधन : इस प्राणायाम को बहुत ही सरल माना जाता है और हर प्राणायाम की शुरुआत से पहले नाड़ीशोधन प्राणायाम किया जाता है. इसको करने के लिए सबसे अच्छा समय प्रातःकाल को माना जाता है. इससे नाडीयों की शुद्धि होती है और इन्हें मजबूती मिलती है.

नाड़ीशोधन प्राणायाम करने की विधि : इसको करने के लिए आप सुखासन अवस्था में पालथी मारकर बैठ जायें और अपने नेत्रों को खुलें रखें. अब आप अपनी दायी नासिका को बंद करके बायीं नासिका से सांस को अंदर खींचे और उसे नाभिचक्र तक ले जायें. आप महसूस करें कि खिंचा हुआ सांस आपको स्पर्श करें. अब आप इसे अपने भीतर रोकने की कोशिश करें. अब आप जिस नासिका से सांस खिंचा था उसे नासिका से सांस को बाहर निकालें. अब आप कुछ देर सांस न लें. इसके बाद आप इस प्रक्रिया को दूसरी नासिका के छिद्र के साथ दोहरायें. इस तरह आप तीन बार करें. फिर आप दोनों नासिका से सांस को अंदर लें और अपने मुहं से सांस को भर निकाल दें. CLICK HERE TO READ MORE SIMILAR POSTS ...
Pranayam or Yog ke Prakar
Pranayam or Yog ke Prakar 
लाभ : ये आपके श्वसन प्रणाली को मजबूत करता है और आपको सांस से होने वाली हर तरह की समस्या से निजात दिलाता है. इसको करने से आपके मन को शांति मिलती है और आप सारा दिन ताजा और तनावमुक्त महसूस करते हो.

2.       भ्रामरी : भ्रामरी प्राणायाम को नाक खर्राटे के नाम से भी जाना जाता है. भ्रामरी प्राणायाम व्यक्ति को मानसिक तनाव से बचाकर, उसे विचारों पर काबू करने की शक्ति प्रदान करता है. इस प्राणायाम को करते वक़्त काले भँवरे की तरह स्वर निकलना होता है. इस प्राणायाम को करने के लिए कोई समय निर्धारित नही है इसे आप कहीं भी और कभी भी कर सकते हो.

भ्रामरी प्राणायाम करने की विधि : इसके लिए आप अपनी कमर को सीधा करके बैठ जायें और अपनी उँगलियों को आँखों पर रखकर बंद कर लें, साथ ही आप अपने अंगूठो को अपने कानो पर रखें. ध्यान रहे कि आपकी उँगलियों से आपकी आँखों पर जोर न पड़े. अब आप सांस को अंदर लेकर एक मधुमक्खी की तरह आवाज को निकालें. इसके साथ ही आप धीरे धीरे सांस को भी छोड़ते रहें.

लाभ : इससे आपके ज्ञान में वृद्धि होती है और आपका मूड ताजा होता है. ये आपको यौगिक ध्यान की प्राप्ति में भी मदद करता है.

3.       कपालभाती : इस प्राणायाम को कपाल उदय सांस, ललाट मस्तिष्क शोधन और कपालभारती के नाम से भी जाना जाता है. मनुष्य के मस्तिष्क के आगे वाले हिस्से को कपाल कहा जाता है और भाती का अर्थ होता है ज्योति. इस तरह कपालभाती प्राणायाम का अर्थ उस प्राणायाम से हुआ जो मस्तिष्क की ज्योति को रोशन करता है. कपालभाती प्राणायाम हठयोग में आता है और इसे सभी प्राणायामों में सबसे कारगर प्राणायाम माना जाता है. इस प्राणायाम में श्वास को छोड़ने पर अधिक जोर दिया जाता है. CLICK HERE TO READ MORE SIMILAR POSTS ...
प्राणायाम और योग के प्रकार
प्राणायाम और योग के प्रकार 
कपालभाती प्राणायाम करने की विधि : इसके लिए आप पद्मासन मुद्रा में बैठ जायें और पेट के अगले हिस्से को हल्का सा झटका देकर अंदर की तरफ करें और अपनी नाक से सांस को बाहर करें. अब आप अपने पेट को ढीला छोड़ दें और फिर से हलके झटके से सांस को बाहर निकालें. इसी तरह आप कुछ देर तक करते रहें.

लाभ : ये शरीर को स्फूर्ति प्रदान करता है और शरीर में गर्मी पैदा कर शरीर को बिमारियों और एलर्जी से बचाता है.

4.       केवली / कुंभक : केवली प्राणायाम को कुम्भको का राजा माना जाता है. इसको सिखने के लिए आपको किसी तरह की मेहनत नही करनी होती बल्कि आप इसका अभ्यास बाकी प्राणायाम के साथ आसानी से कर सकते हो. इस प्राणायाम को कुछ योगाचार्य प्लाविनी प्राणायाम भी कहते है.

केवली प्राणायाम करने की विधि : इसको करने के लिए आप पद्मासन अवस्था में बैठ जायें. ध्यान रहे कि आपका सिर, आपकी कमर और आपकी गर्दन सीधी हो. अब आप अपनी नाक के दायें छिद्र को बंद कर बायें छिद्र से सांस को अंदर लें इसे पूरक कहा जाता है. अब आप अपनी नाक के दोनों छिद्रों बंद करके अपनी सांस को रोकें. इसे अभ्यंतर कुंभक कहा जाता है. इसके बाद आप अपनी नाक के दोनों छिद्रों को छोड़ दे और सांस को धीर धीरे छोड़ें. इसे रेचक कहा जाता है. रेचक को पूरक से दोगुना रखा जाता है. ध्यान रहे अधिक तेज गति से सांस लेने या छोड़ने से आपकी नर्वस सिस्टम पर असर पड़ सकता है. इस तरह आप इस प्राणायाम को आसानी से कर सकते हो.

लाभ : इस प्राणायाम के बारे में कहा जाता है कि इसे अगर कोई व्यक्ति 6 महीने नियमित रूप से कर ले तो वो साधारण व्यक्ति न रखकर पूजनीय हो जाता है. क्योकि ये प्राणायाम काम, क्रोध, लोभ, मोह और इर्ष्या से मुक्ति दिलाता है. इससे आपकी आत्मा का मनोबल बढ़ता है और आप अपने लक्ष्य पर दृढ़ बने रहते हो.
Types of Pranayam and Yog
Types of Pranayam and Yog
5.       अनुलोम विलोम : अनुलोम विलोम को वैकल्पिक नथुने श्वास भी कहा जाता है. अनुलोम विलोम में अनुलोम से अर्थ होता है सीधा और विलोम का अर्थ होता है उल्टा. यहाँ सीधे से अर्थ नासिका के सीधे / दाये छिद्र और उलटे से अर्थ नासिका के बायें छिद्र से है. इस प्राणायाम से नाक के दाये छिद्र से सांस को लिया जाता है और बायें छिद्र से छोड़ा जाता है.

अनुलोम विलोम प्राणायाम करने की विधि : इसके लिए आप सबसे पहले पद्मासन, या सिद्धासन या फिर सुखासन अवस्था में बैठ जायें. फिर आप अपने दायें हाथ के अंगूठे से अपनी नाक के दाये छिद्र को बंद करें और बायें छिद्र से सांस को अंदर लें. अब आप अपनी दायी नासिका के छिद्र को छोडकर, अपनी उँगलियों से बायें छिद्र को बंद करें और दायी नासिका से सांस को अंदर लें. इसी तरह आप कम से कम 8 से 10 बार जरुर करें. किन्तु ध्यान रहे कि इस प्राणायाम को 10 मिनट से ज्यादा न करें. इस प्राणायाम को करने के लिए आप सुबह के समय का चयन करें.

लाभ : इससे श्वास नाड़ियाँ स्वस्थ और निरोगी बनी रहती है, साथ ही इस प्राणायाम को करने वाले व्यक्ति को गठिया, जोड़ो के दर्द की शिकायत कभी नही होती. इसके रोजाना अभ्यास से फेफड़े शक्तिशाली होते है और शरीर का कोलेस्ट्रोल स्तर कम होता है. ये उक्त रक्तचाप, हृदय की समस्या, पक्षाघात, तंत्रिका संबधी, अस्थमा, और साइनस जैसी बिमारियों से भी निजात दिलाता है.

6.       भ्रस्त्रिका : भ्रस्त्रिका एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है धौकनी. धौकनी की सहायता से लोहार तेज हवा को बाहर निकलता है और लोहे की अशुद्धि को दूर करता है उसी प्रकार इस प्राणायाम में तेज हवा बाहर निकाल कर मन और शरीर की अशुद्धि को दूर किया जाता है. इस आसन को करने से आपके फेफड़ों को भरपूर मात्रा में ऑक्सीजन मिलती है. ये श्वसन प्रणाली के विकारो को दूर करता है और चेतना को शुद्ध कर उसे बढ़ाता है. इससे आपके गले का बलगम खत्म होता है और ये पाचन तंत्र को बढ़ाता है.
प्राणायाम करने की विधि और लाभ
प्राणायाम करने की विधि और लाभ
7.       उज्जाई / उज्जायी : उज्जायी क्रिया और प्राणायाम व्यक्ति को कई तरह के रोगों से मुक्त कराता है. इसे आप किसी योग्य शिक्षक की मदद से ही करें. उज्जायी प्राणायाम को करने के लिए आपको अपने कंठ को सिकोड़ कर इस प्रकार श्वास लेना और छोड़ना होता है कि श्वास नालिका में घर्षण पैदा हो. इस प्राणायाम को करने से कबूतर की आवाज की तरह ध्वनि उत्पन्न होती है. ये स्वर तंत्र और श्वास नालिका को संतुलित रखता है और जल तंत्र को नियंत्रित लाता है.

8.       दीर्घ : जैसाकि आपको पता है कि दीर्घ का अर्थ होता है लंबा, इसीलिए माना जाता है कि इस प्राणायाम को करने से मनुष्य की आयु लंबी होती है और इसे दीर्घायु प्राणायाम भी कहते है. इस प्राणायाम से छाती, फेफड़े और मांसपेशियों को मजबूती मिलती है और ये स्वस्थ भी रहते है. ये प्राणायाम शरीर को तनाव मुक्त कर फुर्तीला और चुस्त बनता है. इस प्राणायाम को तीन चरणों में किया जाता है, पहले चरण में श्वास को नियंत्रित किया जाता है, दुसरे में दुसरे में श्वास प्रश्वास को नियंत्रित कर बढ़ाया / दीर्घ किया जाता है और तीसरे में आंतरिक और बाहरी कुंभक का अभ्यास किया जाता है. इस प्राणायाम को करने से मानसिक शक्ति और चेतना को भी लाभ मिलता है. 

9.       शीतली : इस प्राणायाम को Cooling Breath प्राणायाम भी कहा जाता है क्योंकि इस प्राणायाम को करने से मन और शरीर को शीतलता प्राप्त होती है. इस प्राणायाम को सभी योगासन और प्राणायामों को करने के बाद किया जाता है. ये बहुत ही सरल और उपयोगी प्राणायाम है. इससे करने के लिए आपको अपनी जीभ को बाहर निकल कर गहरी श्वास को अंदर अपने पेट में खींचना होता है. जब पेट में हवा भर जाए तो आप अपनी जीभ अंदर ले और मुहं बांध कर लें. ध्यान रहे कि आप श्वास को तेज गति के साथ भर निकालें. ये प्राणायाम प्यास, भूख और रक्तचाप को कम करता है. पाचनतंत्र ठीक रखता है और हृदय को स्वस्थ रखता है.

10.   मूर्छा : मूर्छा अर्थात बेहोशी. किन्तु चिंता न करें इस प्राणायाम से आप मूर्छित नही होंगे बल्कि इससे वायु मूर्छित होती है अर्थात मन मर्छित होता है और आपको आंतरिक शांति मिलती है. ये प्राणायाम बहुत ही कठिन माना जाता है. इस प्राणायाम को करने के लिए कई तरह की सावधानियों को भी ध्यान में रखना पड़ता है इसलिए इसे किसी अच्छे प्रशिक्षक की निगरानी में ही करें. जब इस प्राणायाम को किया जाता है तो आपक कंठ से पानी के बरसने जैसी आवाज निकलती है. ये भय, चिंता और तनाव को दूर करता है और धातुरोग, प्रमेह और नपुंसकता को दूर करता है.  
Naadishodahn
Naadishodahn
11.   सुर्यभेदन / सुर्यभेदी : व्यक्ति की दायी नासिका सूर्य नाडी से जुडी होती है जिसे सूर्य स्वर भी कहा जाता है और इसीलिए इस प्राणायाम में पूरक दायी नासिका से किया जाता है और इस प्राणायाम को सूर्य भेदन प्राणायाम कहते है. सुर्यभेदन प्राणायाम को करने के लिए आप किसी भी सुखासन में बैठकर मेरुदंड को सीधा कर लें प्रणव मुद्रा बना लें और अपनी दायी नासिका पर ऊँगली रखें, फिर बायीं नासिका बंद कर आप दायी नासिका से सांस लेते हुए अपने पेट और सीने को फूलते हुए इस क्रिया को करें. इस प्राणायाम के नियमित अभ्यास से शरीर के अंदर गर्मी उत्पन्न होती है इसीलिए सर्दियों में इस प्राणायाम को कनरे से अनेक लाभ मिलते है और ये नजला, खांसी, दमा, हृदय और पाइल्स के रोगों को दूर करता है.

12.   चंद्रभेदन / चंद्रभेदी : ये सूर्य भेदी से ठीक उल्टा है. चंद्रभेदी प्राणायाम को करने से व्यक्ति की चंद्र नाडी क्रियाशील हो जाती है और शरीर के सम्पूर्ण नाडीमंडल में शीतलता का संचार होता है. इसे करने के लिए आपको आपकी बायीं नासिका से श्वास को अंदर लेकर रोके रखना होता है और दायी नासिका से धीरे धीरे श्वास छोड़ना होता है. अगर किसी व्यक्ति को उक्त रक्तचाप की समस्या है तो उसे इस प्राणायाम को जरुर करना चाहियें. ये आपको की जलन, नाक से खून का बहना आदि समस्यों से मुक्त कराकर मन को शांत और शरीर को चुस्त बनाता है.

13.   प्रणव : इसे ॐ का ध्यान भी कहा जाता है. इस प्राणायाम को करने के बाद आपको अपना सारा ध्यान सांस पर केन्द्रित करके ॐ का स्मरण करना होता है. आप लम्बी लम्बी सांसे लें और उसकी आवाज को सुनें. इसमें सांस को बहुत ही धीरे से लिया जाता है. ॐ को स्मरण करने के लिए आप अपनी भौंहों, आँखों, नाक, कान, होंठ और दिल पर ध्यान लगायें. इससे आपको आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक उर्जा का अनुभव होता है. ये शारीरक विकारो पर काबू पाकर अच्छा स्वास्थ्य देता है और आपको भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ाता है.
How to Practice Pranayam
How to Practice Pranayam
14.   अग्निसार / प्लावनी : इस आसन के नाम में ही अग्नि है अर्थात ये शरीर के अंदर अग्नि उत्पन्न कर शरीर के अंदर के रोगाणु को नष्ट करता है. इस प्राणायाम की खास बात ये है कि इसे आप खड़े होकर, बैठकर या लेटकर कैसे भी कर सकते हो. आप चाहे तो सिद्धासन में बैठकर अपने दोनों हाथों को अपने घुटनों पर रखें और जितनी देर हो सके श्वास को अपने पेट में रोककर अपनी नाभि को झटका दें. इस प्राणायाम से पाचन क्रिया मजबूत होती है और ये शरीर से सभी तरह के रोगाणुओं को भस्म कर शरीर को स्वस्थ बनती है. इससे मोटापे और कब्ज जैसे रोगों से भी मुक्ति मिलती है.

15.   उद्गीथ : इसे जप सांस और ॐ उच्चारण प्राणायाम भी कहा जाता है. भगवान ने इस शरीर को और इस ब्रह्मांड को ओमकार के रूप में बनाया है. ओमकार कोई विशेष व्यक्ति या आंकड़ा नही है बल्कि एक दिव्या शक्ति है जो पुरे ब्रह्मांड को नियंत्रित करती है. ॐ का जप या उच्चारण करने से आप उर्जावान महसूस करते हो. इस प्राणायाम को करने से यही अभिप्राय है और इसे करने के लिए आप गहरी सांस लेते और छोड़ते हुए ॐ का उच्चारण जरुर करने. जितना लंबा आप ॐ का उच्चारण करते हो उतना ही अधिक ये आपके लिए लाभदायक होता है. इससे मन को शांति मिलती है.

16.   बाह्य : जैसेकि इसके नाम से ही पता चलता है कि इस प्राणायाम को करते वक़्त आपको अपने फेफड़ो से सारी हवा को बाहर पूरी तरह बाहर निकलना होता है और इसीलिए इसका नाम बाह्य प्राणायाम है. सारी हवा को बाहर निकालने से अभिप्राय शरीर की सारी दूषित हवा को बाहर निकालकर उसकी जगह शुद्ध हवा को भरने से है. ये प्राणायाम हर्निया, मूत्रालय, गर्भाशय, गुर्दे के रोग, और सेक्स से सम्बंधित समस्यों को दूर करता है.
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प्राणायाम के प्रकार
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