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Mrida ka Nirman Tatha Sanrakshan | मृदा का निर्माण तथा संरक्षण

मृदा का निर्माण और संरक्षण
भूमि के ऊपर की छोटे – छोटे कंकडो और पत्थरों की पतली परत मृदा कहलाती हैं. मृदा की इस परत को बनने में बहुत ही समय लगता हैं. मृदा का निर्माण चट्टानों से, खनिज अर्थात कच्ची धातुओं से तथा जैव पदार्थों से होता हैं. मृदा का निर्माण अपक्षय अर्थात वस्तुओं के गलने – सड़ने से भी होता हैं. जैव पदार्थों और कच्ची धातुओं के मिश्रण से मृदा उपजाऊ बनती हैं. जिससे खेती करने में आसानी होती हैं तथा अच्छी फसल उगती हैं.

मृदा के स्तर
मृदा को कई स्तरों पर बांटा जा सकता हैं –

1.       ह्यूमस तथा वनस्पति के साथ ऊपरी मृदा – यह मृदा अर्थात मिटटी का पहला स्तर होता हैं जिस पर आमतौर पर फसल या घास होती हैं.

2.       बालू, गाद, क्ले के साथ उपमृदा – यह मिट्टी का दूसरा स्तर होता हैं. इस स्तर की मिटटी थोड़ी रेतीली तथा थोड़ी मुलायम होती हैं. इस स्तर पर फसल की तथा घास की जड़ें जमी होती हैं.

3.       अपक्षयित चट्टानी पदार्थ – यह मृदा का तीसरा स्तर हैं. जिसका निर्माण वस्तुओं के गलने व सड़ने से होता हैं.

4.       जनक चट्टानें – यह मृदा या मिटटी का चोथा तथा अंतिम स्तर हैं. इस स्तर पर केवल कठोर चट्टानें होती हैं. जिन्हें जनक चट्टानों के नाम से भी जाना चाहता हैं.

मृदा के प्रकार – काली मृदा, लाल मृदा, जलोढ़ मृदा, मरुस्थलीय मृदा, लैटरराइट मृदा तथा पर्वतीय मृदा के अलग – अलग प्रकार हैं. हमारे देश में मृदा के ये सभी प्रकार अलग – अलग स्थानों पर पाए जाते हैं. CLICK HERE TO READ MORE ABHOUT भूमि एक महत्वपूर्ण संसाधन ...
Mrida ka Nirman Tatha Sanrakshan
Mrida ka Nirman Tatha Sanrakshan 


मृदा को प्रभावित करने वाले तत्व –
1.       मृदा की पारगम्यता अर्थात मृदा को जमाने वाले या उसे समान्तर करने वाले तत्व जनक शैल, रंग, खनिज तथा रासायनिक पदार्थ माने जाते हैं.

2.       मृदा के निर्माण में ह्यूमस की आवश्यकता होती हैं. ह्यूमस तथा अपक्षय का निर्माण करने वाले तत्व वर्षा, जलवायु तथा तापमान होता हैं.

3.       सीधी ऊचाई तथा ढाल आदि तत्वों से मृदा का बचाव होता हैं.

4.       समय भी मृदा को प्रभावित करने वाला तत्व हैं तथा इस तत्व से मृदा परिच्छेदिका की परत मोटी हो जाती हैं.

5.       वनस्पति, सूक्ष्म जीव मनुष्य तथा जीव – जंतु भी मृदा को प्रभावित करने वाले तत्व हैं. ये तत्व मृदा में ह्यूमस अर्थात गर्माहट बनाते हैं.

मृदा का क्षय या निम्नीकरण कैसे होता हैं  
मृदा के तत्त्वों में कमी होने से तथा मृदा के अपरदन होने से मृदा के गुणों में कमी आ जाती हैं जिसके कारण मृदा अनुपजाऊ हो जाती हैं जिसका सीधा असर हमारे पर्यावरण पर तथा फसलों पर पड़ता हैं. मृदा के गुणों का स्तर नीचे गिरने का जिम्मेदार मनुष्य तथा प्रकृति दोनों ही हैं. इसके अलावा कुछ और कारण हैं जिनके कारण मृदा के गुणों में कमी आ जाती हैं. इन कारणों की जानकारी निम्नलिखित दी गई हैं-

1.       वनोंमूलन अर्थात पेड़ों को काटकर वनों को नष्ट करने के कारण भी मृदा का स्तर नीचे गिर जाता हैं तथा उसके गुणों में कमी आ जाती हैं.

2.       पशुओं के द्वारा चारा अधिक चरने के कारण भी मृदा के गुणों में कमी आ जाती हैं.

3.       रसायनिक खाद तथा कीटनाशक दवाइयों का फसलों को उगाने के लिए प्रयोग करने से भी मृदा का निम्नीकरण हो जाता हैं.

4.       लगातार वर्षा होने के कारण भी मृदा के तत्व घट जाते हैं.

5.       भूस्खलन अर्थात चट्टानों के गिर जाने से तथा बाढ़ आ जाने से भी मृदा का निम्नीकरण होता हैं. CLICK HERE TO READ MORE ABOUT प्राकृतिक संसाधन के प्रकार ...
मृदा का निर्माण तथा संरक्षण
मृदा का निर्माण तथा संरक्षण 


मृदा संरक्षण के तरीके
1.       मल्च बनाकर मृदा का संरक्षण किया जा सकता हैं. इसके लिए पौधों को एक कतार में उगाया जाता हैं तथा पौधों के बीच की भूमि को जैव पदार्थ प्रवाल से ढक दिया जाता हैं.

2.       वेदिका फार्म के द्वारा खेती कर के भी मृदा का निम्नीकरण होने से बचाया जा सकता हैं. वेदिका फार्म के द्वारा खेती ऊपर से नीचे की ओर तेजी से आते हुए ढलान पर की जाती हैं. ऊपर से निचे आते हुए ढलान पर खेती इसलिए की जाती हैं की फसल को उगाने के लिए सीधा व सपाट स्थान मिल जाए. इससे मृदा का अपरदन तथा निम्नीकरण कम होता हैं.

3.       सम्मोचरेखीय जुताई कर के भी मृदा के गुणों को कम होने से बचाया जा सकता हैं. यह जुताई पहाड़ों के सबसे ऊचे ढाल पर की जाती हैं तथा इस पद्धति में पहाड़ों से बहने वाले जल को रोकने के लिए समान ऊचाई वाली रेखाओं से एक प्राकृतिक रूकावट बनाई जाती हैं. जिससे मृदा का क्षय कम होता हैं.

4.       रक्षक मेलाखाओं के द्वारा वृक्ष लगकर भी मृदा की हानी होने से रोका जा ससकता हैं. इसमें पेड़ों को एक पंक्ति में सीधा लगाया जाता हैं. जिससे की तटीय क्षेत्रों से तथा ठन्डे देशों से आने वाली हवाओं को रोका जा सके. इस पद्धति को अपनाने से मृदा के बिना ढके हुए स्थान पर तेज हवाओं का असर नहीं होता तथा मृदा का संरक्षण होता हैं.

5.       चट्टान बाधा के द्वारा भी मृदा का संरक्षण या बचाव किया जा सकता हैं. इसमें पानी को तेजी से बहने से रोकने के लिए चट्टानों के द्वारा बाधाएं तथा अवरोधक बनाए जाते हैं. चट्टान बाधा बनाने से नालियों की रक्षा होती हैं तथा मृदा का क्षय भी नहीं होता.

6.       बीच की फसल उगाकर भी भूमि के गुणों को कम होने से बचाया जा सकता हैं. इस पद्धति में अलग – अलग प्रकार की फसलों को एक पंक्ति छोड़कर दुसरी पंक्ति में उगाया जाता हैं. इस पद्धति को अपनाने से मृदा पर वर्षा दोहन का असर नहीं होता तथा मृदा की सुरक्षा हती हैं.

7.       समोच्च रेखीय रोधिकएं – इस प्रणाली में पहाड़ पर पत्थर, घास तथा मृदा का उपयोग कर बाधाएं बनाई जाती हैं तथा इन बाधाओं के जरिए पानी को इकट्ठा करने के लिए खाई भी बनाई जाती हैं. जिससे मृदा तथा जल दोनों का संरक्षण होता हैं.    

मृदा का निर्माण तथा संरक्षण के बारे में अधिक जानने के लिए आप तुरंत नीचे कमेंट करके जानकारी हासिल कर सकते है.
Mrida ka Nirman
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